Sunday, April 24, 2016

कविता में झाकता नंगा सच

पैसा !!!!!!!!!!!!!!!!!
मुझे न पता था कि,
एक दिन इतना ,
अकेला रह जाऊंगा ,
बात करूँगा पर ,
सामने सिर्फ सन्नाटी,
दीवार ही पाउँगा
लोग मेरी गरीबी ,
का मजाक उड़ाते ,
मिल जायेंगे ,
पैसा का हक़ दिखा कर ,
हर पल मेरी हैसियत
बता जायेंगे  पर  ,
किसी को क्या पता
मिटटी के महादेव
की कहानी ,
राम को समुन्द्र
उसी के सहारे
पार करा जाऊंगा ,
सोने की लंका में ,
बैठी सीता न सही ,
रावन का अहंकार ,
मिटा ही जाऊंगा ,
मंजूर है अर्जुन ,
और राम का वो
चौदह साल का वनवास ,
हस्तिनापुर भी मेरा होगा
और लंका का अहम्
अब जला ही जाऊंगा ............डॉ आलोक चान्टिया, अखिल भारतीय अधिकार संगठन

Tuesday, March 8, 2016

औरत ...आज और कल

वो चुप रह कर
औरत का बीच चौराहे
पर चीर हरण
करवाते है ,
मारना पीटना .
गाली उत्पीड़न देख
कर भी चुप रह जाते है ,
क्योकि वो भीष्म है
शासन की कुर्सी
से आज भी बंधे है ,
सब कुछ देखते है
पर आँखों के सामने
उनके बच्चे ,
उनका वेतन
उनका भविष्य
घर परिवार की जिम्मेदारियां
हस्तिनापुर बन कर
सामने आ जाते है |
और वो  सब देख कर भी
चुप रह जाते है ,
अनसुना कर जाते है |
क्योकि वो जानते भी है
और मानते भी है ,
द्रौपदी खुद ही उनके
विनाश की शपथ लेगी ,
आदमी से ज्यादा
कृष्ण से रोयेगी ,
उसकी गरिमा , अस्मिता
का अविरल युद्ध ,
खून से लेथ पथ ,
उन्ही के सामने होगा
अब बारी समाज की होगी
कलम के डेकन की होगी |
कोई द्रौपदी पर
कविता  लिख डालेगा
कोई उसे महान
महिला कह डालेगा ,
कोई उस पर कहानी
उपन्यास , नाटक ,
की रचना करेगा
खुद को साहित्यकार
बना कर मंडन करेगा
पर चौराहे पर नग्न
इज्जत को देख चुप रहेगा
खुद की दो रोटी
और इज्जत से ज्यादा
वो क्यों कुछ भी
कभी भी खुल कर
औरत के लिए कहेगा
कल आज और कल
औरत यूँ ही खुद
को आजमाती रहेगी
और किसी मंच से
कहानी नाटक , नौटंकी
कविता चलती रहेगी ,
लेखनी के दलाल
कभी औरत के लिए
नहीं लौटायेंगे अपने
शाल ,और सम्मान
क्योकि वो भी तो
कलम की भूख में
चाहते औरत का अपमान |
द्रौपदी कितनी कातर है
देख अपना ये सिलसिला
कल भी और आज भी
घर के बहार क्या मिला !!!!!!!!!!!!!!!!!!
आइये औरत के लिए कुछ दिन कुछ पल सच के लिए जिए मैंने ये लाइन उन उच्च कोटि के साहित्यकारों को समारित की है जो ये जानने के बाद भी की लड़की के साथ अन्याय हुआ है वो लड़की पर ही ऊँगली उठा कर अपने को साहित्यकार बनाने में जुटे रहते है ...............डॉ आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन

Thursday, December 31, 2015

शुभकामना शुभकामना
नए साल का ,
सब करें सामना |
दुःख में दिखे कोई ,
दर्द को कहे कोई ,
हाथ उसी का ,
तुम थामना ,
शुभकामना शुभकामना .
सन्नाटे से पथ हो ,
रात हो अँधेरी ,
चीख सुनी कोई ,
तो उसे जानना ,
शुभकामना शुभकामना
खुशियों के पल हो ,
खुशियों के कल हो ,
जीवन ही ऐसा ,
तुम फिर बांटना,
शुभ कामना शुभकामना
नए साल का ,
सब करें सामना ....................
अखिल भरित्ये अधिकार संगठन आप सभी को आने वाले चक्रिये समय के प्रतीक नव वर्ष के लिए शुभकामना प्रेषित करता है |.......आपका आलोक चान्टिया

Tuesday, November 17, 2015

श्रद्धांजलि .पेरिस के मानव को

कितनी अजीब बात थी ,
वो एक मनहूस रात थी ,
तारो से चमकते आसमान में,
गोलियों की बरसात थी ,
आतंकवाद की फसल उगी ,
मानवता फिर हैरान थी ,
निर्दोष मर गए जाने क्यों ,
बात नही आसान थी ,
शेर भेड़िये भी हुए शर्मिंदा ,
ये उनकी कैसी पहचान थी ,
आदमी को आदमी ने मारा ,
संस्कृति की कैसी ये शान थी |......
अखिल भारतीय अधिकार संगठन पेरिस में मारे गए मानव को श्रद्धांजलि अर्पित करता है

Monday, August 31, 2015

कहते क्यों नहीं

न जाने क्यों ,
जीवन मुझे महसूस
नहीं होता |
दिन भी होता है
रात भी होती है पर ,
 महसूस नही होता|,
एक सन्नाटे सा
फैलता पसरता ,
रोज हर तरह |
एक शोर सा ,
होता अंदर जैसे,
हो कोई विरह |
सांस का होना गर ,
जीवन है आलोक ,
तो चलती क्यों नही| ,
मौत का किलोल ,
सुनती भी नहीं ,
क्यों ढंग से सही |,
मानव तो वो भी ,
जो मारते मानव को ,
हर दिन हर रात |
कहते दानव क्यों ,
नहीं उनको कभी ,
करते सच्ची बात |

Sunday, August 23, 2015

भौत आदमी से बेहतर है

मुर्दो ने पूछा ,
आज यहाँ क्यों,
आये हो ,
क्या अपने घर ,
का रास्ता भूल ,
आये हो ,
मैंने कहा सुना था ,
भूत लोगो को ,
डराते है ,
कभी सपने में ,
को कभी सामने ,
आ जाते है |
पर अब तो शहर ,
में शैतान रहने ,
लगे है ,
लोग कुछ ज्यादा ,
सहमे सहमे से ,
रहने लगे है |
सड़क , घर , रेल ,
स्कूल में शरीर ,
को खाते है |
सच में श्मशान ,
हैवानो से बचाने,
खुद को आते है |
भूत आदमी से ,
काफी अच्छा साबित ,
हो रहा है |
बलात्कार , छेड़छाड़ ,
उसे आज भी परहेज ,
हो रहा है |
.........................बचपन में भूत की कहनी सुना कर हमको डराया जाता था पर आज सड़क पर कुछ हो ना जाये इस लिए डराया जाता है क्या आदमी भूत को भी पीछे छोड़ आया ????????? आलोक चान्टिया अखिल आरतीय अधिकार संगठन ...जियो और जीने दो

Saturday, August 22, 2015

रोज नयी बात लाता हूँ

हर दिन ही तो ,
मैं खुद को तमाशा ,
बनाता हूँ ,
ना जाने कितने ,
शब्दों में रंग के ,
कोई बात लाता हूँ ,
तुम अपने नशे में ,
रोज तौलते हो ,
शब्द और मुझको,
तुमसे कह कर भी ,
दुनिया के लिए ,
क्या पाता हूँ ?
डंक मार दोगे,
आदमी का दर्द ,
जाने बिना एक बार ,
ये जान कर भी मैं ,
बिच्छू का सच लिए ,
आ जाता हूँ ,
हर दिन ही तो ,
मैं खुद को तमाशा
बनाता हूँ |
ना जाने कितने
शब्दों में रंग के
कोई बात लाता हूँ .......................शायद हम कुछ समझा नहीं चाहते इसी लिए किसी भी सुधर या नए कल में वक्त लगता है .................आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन