Monday, December 3, 2012

lipat gaya

सुबह से ऊब कर सूरज छिप गया ...............चाँद भी आकर अँधेरे से लिपट गया .................मैं क्या करू अब जाग कर आलोक ...................नींद की आगोश में झट सिमट गया .................कल तक लगा सब जीते ही नही अब .......................टिमटिमाते तारे से कोई दीपक निपट गया .............कुछ देर दुनिया से दूर आओ चले हम .......................... जिन्दगी का दौर फिर मुझे झपट गया ............................न जाने क्यों हम यह समझते है की कोई उसके लिए जी रहा है पर ऐसा है नही ......बस आपके रस्ते में कोई आ जाता है और आपको लगता है कि वो आपके साथ साथ है पर दोनों अपना अपना रास्ता जीते है ...जैसे अभी रस्ते में रात आ गयी और हम कह उठे ...शुभ रात्रि

5 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना
    थोड़ा व्यवस्थित कर लें...

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  2. अच्छे भाव हैं......
    सहज सी प्रस्तुति..

    अनु

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    1. bas lagta hai ki andhere ko kyo na guguna lu ..sabko uska ek nya chehra dikha dun

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  3. बहुत ही बढ़िया

    सादर

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  4. एक निवेदन
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