Saturday, March 9, 2019

औरत के लिए कौन बोलेगा

औरत !!!!!!!!!!!!!!!!
वो चुप रह कर
औरत का बीच चौराहे
पर चीर हरण
करवाते है ,
मारना पीटना .
गाली उत्पीड़न देख
कर भी चुप रह जाते है ,
क्योकि वो भीष्म है
शासन की कुर्सी
से आज भी बंधे है ,
सब कुछ देखते है
पर आँखों के सामने
उनके बच्चे ,
उनका वेतन
उनका भविष्य
घर परिवार की जिम्मेदारियां
हस्तिनापुर बन कर
सामने आ जाते है |
और वो सब देख कर भी
चुप रह जाते है ,
अनसुना कर जाते है |
क्योकि वो जानते भी है
और मानते भी है ,
द्रौपदी खुद ही उनके
विनाश की शपथ लेगी ,
आदमी से ज्यादा
कृष्ण से रोयेगी ,
उसकी गरिमा , अस्मिता
का अविरल युद्ध ,
खून से लेथ पथ ,
उन्ही के सामने होगा
अब बारी समाज की होगी
कलम के दावेदारों की होगी |
कोई द्रौपदी पर
कविता लिख डालेगा
कोई उसे महान
महिला कह डालेगा ,
कोई उस पर कहानी
उपन्यास , नाटक ,
की रचना करेगा
खुद को साहित्यकार
बना कर मंडन करेगा
पर चौराहे पर नग्न
इज्जत को देख चुप रहेगा
खुद की दो रोटी
और इज्जत से ज्यादा
वो क्यों कुछ भी
कभी भी खुल कर
औरत के लिए कहेगा
कल आज और कल
औरत यूँ ही खुद
को आजमाती रहेगी
और किसी मंच से
कहानी नाटक , नौटंकी
कविता चलती रहेगी ,
लेखनी के दलाल
कभी औरत के लिए
नहीं लौटायेंगे अपने
शाल ,और सम्मान
क्योकि वो भी तो
कलम की भूख में
चाहते औरत का अपमान |
द्रौपदी कितनी कातर है
देख अपना ये सिलसिला
कल भी और आज भी
घर के बाहर उसे क्या मिला !!!!!!!!!!!!!!!!!!
आइये औरत के लिए कुछ दिन कुछ पल सच के लिए जिए मैंने ये लाइन उन उच्च कोटि के साहित्यकारों को समर्पित की है जो ये जानने के बाद भी की लड़की के साथ अन्याय हुआ है वो लड़की पर ही ऊँगली उठा कर अपने को साहित्यकार बनाने में जुटे रहते है ...............डॉ आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन

Wednesday, January 30, 2019

मेरी जान

श्मशान में खड़ा मै,
रागिनी गा रहा हूँ ,
मौत को सुना कर ,
अभी लोरी आ रहा हूँ ,
जान कर भी बहरे ,
क्यों बने जा रहे हो ,
कोई आदमी तडपता,
नही देख पा रहे हो ,
मेरी मौत की दावत ,
हो तुम्हे ही मुबारक ,
आलोक का जनाजा ,
लिए कहा जा रहे हो ,
देख मुझको जिन्दा,
क्यों मरे जा रहे हो ,
.......................काश मानव शास्त्र में मनुष्य बनाने के तरीके भी पढाये जाते ......Dr Alok chantia AIRO

Sunday, January 20, 2019

मौत

आज लिखने को सिर्फ दर्द है ,
क्योकि उनका चेहरा सर्द है ,
खोया है उनको जो अपने है ,
आज जो है पर अब सपने है ,
कल जिनकी ऊँगली सूरज थी ,
कल जिनकी थपकी चाँद थी ,
आज वही खुद तारे बन गए ,
पुरखो से वो हमरे बन गए ,
पुकारने पर लौटेगा सन्नाटा ,
बेटा कहने कोई नहीं आता ,
कल जिसके कदमो पर सर ,
आज उसकी चिता जला रहा ,
ये दुनिया में मैं क्या पा रहा ,
अपने ही रोज खोता जा रहा ,
कोई है जो बताये आलोक कोआज ,
क्यों उनके घर अँधेरा होता जा रहा

मताधिकार

मताधिकार ......मताधिकार
प्रजातंत्र का देखो ये ,
अद्भुत सा हथियार
देश को हम बदल देंगे ,
विकास पे हम फिर चल देंगे ,
डाल के मत को बदल डालो
राजनीती इस बार
मताधिकार मताधिकार .....
आप भी आकर मत डालो
हम भी आकर मत डाले
आस पड़ोस से कह दो निकलो,
छोड़ के घर बार ,
मताधिकार ...मताधिकार .....
बूंद बूंद से घट है भरता ,
हर एक मत से समाज है बनता ,
राम राज्य का मत से कर दो
सपना फिर साकार ...
मताधिकार ..मताधिकार ....
यथा राजा तथा प्रजा ,
यथा भूमि तथा तोयम
आपका मत बना देगा
जनता की सरकार
मताधिकार मताधिकार

Friday, January 18, 2019

भरोसा

जो मर गए या ,
मरे से जी रहे है ,
दरकार वही ही चार,
कंधो की कर रहे है ,
जिन्दा है जो या ,
जिन्दा समझ रहे है ,
वही आज खुद पे ,
यकीन कर रहे है ,
रास्ते वो खोजते जो,
बनाते रास्ते नहीं,
जिन्हें भरोसा पावों पर ,
आलोक वही कर रहे है .........................................शुभ रात्रि
डॉ आलोक चांटिया
अखिल भारतीय अधिकार संगठ

जिन्दगी

जिन्दगी इस सच के कुछ भी नहीं ,
कि मौत रोटी से हारती है ,
जब रोटी भी थक जाती है ,
तब कही साँस हमें मारती है
२-
मैंने ही तो माँगा था ,
सांसो का कारवां तब ,
क्यों थक रहे हो आज ,
मानव बन कर अब
३-
कितने हताश दिखे तुम ,
आज रिश्तो के बाज़ार में ,
जो भी बिक रहा था वहा,
बस कुछ ही हज़ार में ,
कितना चाहा कोई मिले ,
बिना किसी मोल तोल का ,
पर दिखाई जो दिया कभी ,
पता नहीं किस खोल का

मन हसता है

कभी कभी मन भी हस लेता है ,
कोई ओठो में बस लेता है ,
पर कौन देखता इन आँखों में ,
जो सन्नाटो को भर लेता है ,
हर तरफ हाथो की हल चल ,
कोई पैरो में कुचल लेता है ,
ऐसे तो आलोक है अंधरे में भी ,
पर कौन पश्चिम को वर लेता है ,
चल कर जिन्होंने देखा नंगे पांव ,
वही काँटों से मोहब्बत कर लेता है ,
उनको मालूम है जीवन का मतलब ,
जो एक बार मौत को जी लेता है ,
क्या चलोगी और जिन्दगी यू ही ,
जब मन ओठो का नाम पी लेता है

Thursday, January 17, 2019

विरासत

जिन्दा तो वो भी है ,
जो अब जिन्दा नहीं है ,
अक्सर वही तो रहते है ,
हमारी आपकी बातों में ,
आप को जनता ही कौन,
अगर वो साथ में नहीं ,
एक विरासत बनाते है ,
जैसे सपने रातों में ,
कभी मत कहना कि,
तुम मर गए हो कभी ,
क्योकि जिन्दा थे कहाँ ,
बात तुम्हारी बाकी अभी

चक्र

क्यों रोता है मन ,
किसको जीता है तन ,
मैं तो अकेला आया ,
फिर ये किसको पाया ,
मैं जाऊंगा भी अकेले ,
छूटेंगे दुनिया के मेले ,
तो कौन साथ में हैं ,
आज फिर रात में हैं ,
दिख तो सन्नाटा रहा ,
दिल ने फिर क्या सहा,
धीरे से किसने कहा ,
सो जाओ सपने को ,
आज सजाने के लिए ,
मौत को पाने के लिए ,
यही सच है सबका ,
बस चक्र है जाने के लिए ...................................क्या जन्दगी को आप जानते है या फिर मौत तक पहुचने के रस्ते को जीवन कहते रहे

समय

मुझको मालूम है ,
कि मेरी जिन्दगी में ,
सुबह का सबब ,
थोडा कुछ कम है ,
लेकिन जरा उन ,
अंधेरो से पूछो ,
जो मेरे साथ है,
रौशनी उनका दम है ,
बंजर सूखी जमीन ,
रौंदी गयी पावों से,
सुबह से नहीं वो भी ,
अँधेरी राह से नम है ........................
कष्ट से भागने के बजाये उनका स्वागत कीजिये क्योकि दर्द देकर ही सृजन का अर्थ स्पष्ट किया जाता है|

डॉ आलोक चान्टिया
अखिल भारतीय अधिकार संगठन

Wednesday, January 16, 2019

विकास का भारत

विकास का भारत .......राजनीति के आईने में
सड़क के किनारे ,
भारत माँ चिथड़ो में लिपटी ,
इक्कीसवी सदी में जा रहे देश को दे रही चुनौती ,
खाने को न रोटी ,
पहनने को न धोती ,
है तो उसके हाथ में कटोरा वही ,
जिससे झलकती है प्रगति की पोथी सभी ,
किन्तु
हर वर्ष होता है ब्योरो का विकास ,
हमने इतनो को बांटी रोटी ,
और कितनो को आवास ,
लेकिन
आज भी है उसे अपने कटोरे से आस ,
जो शाम को जुटाएगा ,
एक रोटी ,
और तन को चिथड़ी धोती ,
पर ,
लाल किले से आयगी यही एक आवाज़ ,
हमने इस वर्ष किया चहुमुखी विकास
हमने इस वर्ष किया चहुमुखी विकास

मुखड़े

दर्द में आँखों से जब मोम बहा ,
तब लगा हांड मांस भी जलता है ,
कुछ लोगो को लगा कि आँसू है ,
किसे बताऊँ कोई रोज मिलता है
२-क्यों जिन्दगी चलती है इस कदर ,
कि कुछ करके भी मौत ही पायी,
और मौत का सब्र भी देखिये जरा ,
पैदा होने के पहले से इंतज़ार में ...............................जिसने सब्र किया वही जीतता है मौत की तरह अंततः ..

समय

जिन्दगी किस तलाश में,
मौत से जुदा है ,
मिल जाये तो मिटटी ,
खो जाये तो ख़ुदा है ,
दूर तलक आसमान से ,
फैले तेरे अरमान है ,
बंद मुठ्ठी में भी तेरे,
तरसा एक आसमान है ,
पकड़ता रहा ना जाने क्या,
मिटटी के घरौंदे में
गुजर रहा जो बगल से,
वो समय तेरा इम्तहान है ....................
सिर्फ समय की इज्जत कीजये और पूजिए क्योकि वही आपको बनता और बिगाड़ता है .......
डॉ आलोक चन्टिया

Saturday, January 5, 2019

मौत की दुनिया

मौत की ये ,
किस दुनिया में ,
रहने लगे ,
अपने में सिमट ,
कर आलोक ,
सब रहने लगे ,
मेरे मरने पर ,
कुछ तो कहेंगे ,
बुरा था या ,
अच्छा कहेंगे ,
पर आज मेरी ,
तन्हाई पर ,
न साथ रहेंगे ,
ना कुछ कहेंगे ,
दुनिया जिसे कहते ,
जादू का खिलौना ,
मिल जाये तो मिटटी ,
खो जाये तो सोना ,
कैसे चलेगा ये ,
एक बार इधर ,
आकर भी ना कोई ,
किसी के साथ चलेंगे ,
बस चार कंधो में ,
हमारे साथ रहेंगे ........................... दुनिया यानि सिर्फ अपने चेहरों की तलाश और अपने में जी जाना .......वही हाड मांस का आदमी कभी हिन्दू तो कभी मुसलमान बन जाता है कभी दलित तो कभी सवर्ण बन जाता है यानि मनुष्य कभी एक सूत्र में पिरो कर न देखा जायेगा ....शत शत अभिनन्दन मानव तुमको निश्चय ही तुम जानवरों से भिन्न हो भिन्न हो

सिलसिला

कितना आजीब सा ,
सिलसिला चल रहा ,
मन कही होता ही नहीं ,
पर बरसो से चल रहा ,
दिल होता है पर ,
उसके हम नहीं ,
और मन कहा है ,
हम में किसी में नहीं ,
कैसी है दुनिया जो ,
उनके पीछे है जो
कभी किसी को दिखा ,
न पाया गया ,
क्या मनके बिना भी
इस दुनिया में
कोई लाया गया ............................जैसे मन नहीं दिखाया नहीं जा सकता उसी तरह मैं यह नहीं जनता की मैंने क्या लिख कर क्या कहना चाहा है

Thursday, January 3, 2019

चिंता

चिन्ताओ के ,
भंवर में फसकर ,
कौन कहाँ ,
जी पाता है ,
स्वप्निल दुनिया ,
के सपने लेकर ,
हर कोई यहाँ ,
पर आता है ,
मिल जाये सभी ,
कुछ तो अच्छा है ,
खो जाने पर ,
पछताता है ,
जो पाया है ,
कर्म के पथ पर ,
कण कण हर क्षण ,
जाने कब बिक जाता है ,
कब समझा मानव ,
दुसरो के दर्द को ,
खुद के सुख में ,
हस नहीं वो पाता है ,
धीरे धीरे सब ,
सपने को खोकर ,
पथराई आँखों से वो ,
श्मशान तलक ही आता है ,
क्यों न समझा आलोक ,
ये छोटा सा मर्म यहाँ ,
अंधकार को सच समझ ,
उसका कैसा ये नाता है .......................क्या हम भूल रहे है है की हम जितने भी सुख के पीछे भाग ले और किसी कुचक्र से उसको पा भी ले पर जाना तो है ही .............हम सब अपने पूर्वज के नाम तक नहीं जानते तो आपके इस कार्यो के लिए कौन आपको याद करने जा रहे है ....अगर्ये सच है तो आइये थोडा भाई चारा और सुकून को जी ले

जीवन

पौधे से न जाने कब ,
जिंदगी दरख्त बन गयी ,
किसी के लिए यह ,
ओस की बूंद सी रही ,
तो किसी के लिए ,
मदहोश सी मिलती रही
कोई आकर घोसला ,
अपना बना गया ,
कोई मिल कर ,
होसला ही बढ़ा गया ,
किसी को हसी मिली ,
किसी की सांस खिली ,
कोई जिया ही देखकर ,
कोई आया दिल भेद कर ,
सभी में अपने लिए ,
तोड़ने , मोड़ने , छूने ,
छाया पाने की ललक दिखी ,
किसी ने फूल समझा ,
तो किसी ने कलम बना ,
अपनी ही इबारत लिखी ,
सभी को आलोक मिला ,
पर आलोक का गिला ,
अँधेरे से सब डरते रहे ,
मौत से ही मरते रहे ,
कोई नहीं दिखा आलोक में ,
जोड़ी बनती है परलोक में ,
आलोक पूरा हुआ अँधेरे से ,
रात पूरी होगी सबेरे से ,
आइये चलते रहे दरख्त ,
बनने की इस कहानी में ,
फूल पत्ती शाखो से ,
महकते रहे जवानी में ......................अखिल भारतीय अधिकार संगठन आप सभी को जिंदगी के मायने समझते हुए एक नए कल की शुभ कामनाये प्रेषित करता है ............

समय

#समय
जो भी पाया था ,
उसके जाने का ,
वक्त आ रहा है ,
संजो भी ना सका ,
अब तो लूटने का ,
मंजर आ रहा है ,
जिंदगी आलोक में है ,
रास्ते अंधेरो में ,
गुजर रहे है ,
साँसे तो चल रही है ,
खुद हर किसी में ,
मौत जी रहे है ,
ये कैसा सिला मिला ,
किसी से मिलने का ,
फिर बिछड़ने का ,
मौका भी मिला तो ,
चार कंधो पर ,
आज संवरने का ,
ये वर्ष जो जा रहा है ,
वो वर्ष जो आ रहा है ,
कोई मुझको पा रहा है ,
कोई मुझसे जा रहा है ,
जीना इसी का नाम है ,
चलना इसी का काम है ,
मुबारक हो साल आप सबको,
कल इसकी आखिरी शाम है ....................आइये सोचे कितने अजीब है हम जो यह नहीं समझ पाते कि हम सिर्फ किसी की तलाश में इस दुनिया में नहीं आये बल्कि दुनिया हमको तलाश रही है ......कुछ करने के लिए कुछ कहने के लिए ...अखिल भारतीय अधिकार संगठन

शुभकामना

शुभकामना शुभकामना
नए साल का ,
सब करें सामना |
दुःख में दिखे कोई ,
दर्द को कहे कोई ,
हाथ उसी का ,
तुम थामना ,
शुभकामना शुभकामना .
सन्नाटे से पथ हो ,
रात हो अँधेरी ,
चीख सुनी कोई ,
तो उसे जानना ,
शुभकामना शुभकामना
खुशियों के पल हो ,
खुशियों के कल हो ,
जीवन ही ऐसा ,
तुम फिर बांटना,
शुभ कामना शुभकामना
नए साल का ,
सब करें सामना ....................
अखिल भरित्ये अधिकार संगठन आप सभी को आने वाले चक्रिये समय के प्रतीक नव वर्ष के लिए शुभकामना प्रेषित करता है |.......आपका आलोक चान्टिया

नया साल

बीत गया जो ,
वो अतीत हो गया ,
आ रहा जो समय ,
वो प्रतीत हो गया ,
कहते है कह कर ,
इसे नव वर्ष मनाओ ,
हर ओठ का आज ,
यही गीत हो गया ,
किया जो प्रबंधन ,
पल पल का आलोक
देखो वो कैसे अब
सब का मीत हो गया ,
बहको न तुम ,
न बहके ही हम सब ,
प्रगति की कहानी में ,
वही जीत हो गया ,
नव वर्ष जो लाया ,
वह सन्देश समझ लेना ,
सब को मुस्कराने की ,
देखो रीति बन गया !...अखिल भारतीय अधिकार संगठन नव वर्ष 2019 पर आप सभी को हार्दिक शुभ कामना प्रेषित करता है .................

भगवान्

जो खुद ही ,
टूट गया हो ,
अपनों से ,
छूट गया हो ,
उस फूल से ,
क्या भगवान पाओगे ?
अपनी ही ,
कृति को बर्बाद देख ,
तुमसे ही उसकी ,
मौत को देख ,
क्या भगवान से ,
कुछ भी करा पाओगे ?....................हम मनुष्य भी भगवान के प्रतिनिधि है पर क्या उनको तोड़ कर हम उस भगवान तक पहुच पाएंगे ???????????? अगर नहीं तो बदलिए अपने चारो तरफ ........ डॉ आलोक चांटिया अखिल भारतीय अधिकार संगठन

उम्र

मैं जिसको उस मोड़ पर ,
मानो ना मानो ,
छोड़ आया हूँ ,
और कुछ भी नहीं बस ,
वो मेरा कल जिसे ,
उम्र बना लाया हूँ |
लोग कहते है अब मुझे ,
कुछ बदल से गए हो ,
आलोक इस तरह ,
क्या कहूं उनसे भी ,
कुछ भी नहीं बदला ,
सिवा इस उम्र की तरह ..........

Alok Chantia
अखिल भारतीय अधिकार संगठन